2027 की जनगणना आधारित परिसीमन से झारखंड में ST की 6 विधानसभा और 1 लोकसभा आरक्षित सीट प्रभावित होने की आशंका : आदिवासी छात्र संघ

आज दिनांक : 20 जून 2026 , दिन:शनिवार को आदिवासी छात्र संघ के केंद्रीय अध्यक्ष श्री सुशील उराँव के नेतृत्व में आदिवासी छात्र संघ के  छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने आज लोकभवन, राँची में माननीय राज्यपाल महोदय से मुलाकात किये, तथा वर्ष 2027 में प्रस्तावित परिसीमन, अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की सुरक्षा, पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों के संवैधानिक संरक्षण एवं आगामी जनगणना में पृथक सरना धर्म कोड लागू करने की मांग को लेकर ज्ञापन सौंपा।
प्रतिनिधिमंडल ने मांग रखी कि परिसीमन प्रक्रिया में झारखंड के आदिवासी समाज के ऐतिहासिक, सामाजिक एवं संवैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखा जाए तथा वर्ष 1971 की जनगणना के आधार पर अनुसूचित जनजाति आरक्षित सीटों की वर्तमान संरचना को सुरक्षित रखा जाए।
प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि यदि वर्ष 2027 की जनगणना के आधार पर परिसीमन किया जाता है, तो झारखंड में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों में लगभग 6 सीटों तथा लोकसभा की 1 अनुसूचित जनजाति आरक्षित सीट के प्रभावित होने की आशंका है। इससे राज्य के आदिवासी समाज का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कमजोर होगा। इसी संवैधानिक चिंता को देखते हुए आदिवासी छात्र संघ द्वारा  प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया का विरोध किया जा रहा है।
प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि झारखंड राज्य का गठन आदिवासी समाज के ऐतिहासिक संघर्ष, बलिदान एवं जल-जंगल-जमीन की रक्षा की भावना से हुआ है। इसलिए केवल जनसांख्यिकीय परिवर्तन के आधार पर आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।
आदिवासी छात्र संघ के केंद्रीय अध्यक्ष श्री सुशील उराँव ने कहा कि,
“बिहार राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के प्रावधानों के तहत झारखंड के आदिवासियों को प्राप्त जनजातीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व पूरी तरह अक्षुण्ण है और हमेशा अक्षुण्ण रहना चाहिए। इस संवैधानिक अधिकार में किसी भी प्रकार की कटौती या हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा।”
उन्होंने कहा कि विकास परियोजनाओं, खनन, औद्योगिकीकरण एवं विस्थापन के कारण हुए जनसांख्यिकीय बदलाव का राजनीतिक नुकसान आदिवासी समाज को नहीं दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आदिवासी भूमि, मूलवासी भूमि एवं राज्य सरकार की गैर-मजरूआ भूमि पर हुए अनधिकृत कब्जे, बाहरी व्यापारिक गतिविधियों, व्यावसायिक विस्तार, मुटिया मजदूरी तथा औद्योगिक श्रमिक आबादी से हुए जनसांख्यिकीय बदलाव को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। ऐसे बदलाव को निर्वाचन क्षेत्र के परिसीमन एवं राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
श्री उराँव ने कहा कि झारखंड के मूल निवासियों के लोकतांत्रिक अधिकार, सांस्कृतिक पहचान एवं जल-जंगल-जमीन से जुड़े अधिकारों की रक्षा करना आवश्यक है। उन्होंने आदिवासी समाज से अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति सजग, सतर्क एवं एकजुट रहने का आह्वान किया।
आदिवासी छात्र संघ के केन्द्रीय कोषाध्यक्ष सह संयोजक जलेश्वर भगत ने कहा कि सरना धर्म कोड की मांग कई दशकों पुरानी है और वर्ष 2027 की जनगणना से पूर्व हर हाल में पृथक सरना धर्म कोड लागू किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2005 में आदिवासी छात्र संघ एवं अन्य संगठनों के तत्वावधान में नई दिल्ली स्थित रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (RGI) से मुलाकात कर जनगणना प्रपत्र में पृथक सरना धर्म कॉलम की मांग रखी गई थी।
उन्होंने कहा कि आदिवासी छात्र संघ  द्वारा झारखंड सहित ओड़िशा, बिहार, पश्चिम बंगाल एवं असम में जन-जागरूकता अभियान चलाया जाएगा, ताकि आदिवासी समाज अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान को जनगणना में दर्ज करा सके।
उन्होंने कहा कि सरना धर्म प्रकृति आधारित आदिवासी आस्था एवं संस्कृति की पहचान है। इसलिए आगामी जनगणना प्रपत्र में धर्म कॉलम के अंतर्गत “सरना धर्म” के लिए पृथक विकल्प उपलब्ध कराया जाना आवश्यक है, जिससे आदिवासी समाज की वास्तविक धार्मिक पहचान एवं जनसंख्या का सही आंकलन हो सके।
प्रतिनिधिमंडल मेंकेंद्रीय अध्यक्ष सुशील उराँव,
केंद्रीय कोषाध्यक्ष सह संयोजक
डॉ० जलेश्वर भगत, राँची विश्वविद्यालय अध्यक्ष मनोज उराँव,विद्यासागर,संजय
व रवि उपस्थित थे ।

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