
आजसू ने ज्ञापन के माध्यम से कुलपति महोदया को कहा कि झारखंड सरकार के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग द्वारा जारी संकल्प पत्रांक–05/प0-13/2023 – 902, संकल्प पत्रांक–05/प0-06/2023 – 893 एवं अन्य संकल्प पत्रों के माध्यम से राँची विश्वविद्यालय, इसके अंतर्गत संचालित अंगीभूत महाविद्यालयों एवं झारखण्ड के अन्य विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक एवं गैर-शैक्षणिक पदों के “Restructuring” तथा “Clustering System” को लागू करने का प्रस्ताव रखा गया है।

यह प्रस्ताव राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था, विद्यार्थियों, शिक्षकों, कर्मचारियों तथा झारखंड की भाषाई एवं सांस्कृतिक अस्मिता के लिए अत्यंत चिंताजनक, अव्यावहारिक एवं जनविरोधी प्रतीत होता है। अतः आजसू इस संपूर्ण व्यवस्था का पुरज़ोर विरोध करते हुए माननीय कुलपति महोदया से इसे तत्काल निरस्त करने की मांग करती हैं।
झारखंड सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से अभी भी विकासशील राज्यों की श्रेणी में आता है। राज्य के अधिकांश विद्यार्थी ग्रामीण, आदिवासी, दलित, पिछड़े एवं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। ऐसे विद्यार्थी सीमित संसाधनों के बीच अपने निकटवर्ती महाविद्यालयों में अध्ययन कर पाते हैं। वर्तमान व्यवस्था में एक ही महाविद्यालय में कला, विज्ञान एवं वाणिज्य संकाय उपलब्ध रहने से विद्यार्थियों को विषय चयन की स्वतंत्रता, सहज पहुँच तथा संतुलित शैक्षणिक वातावरण प्राप्त होता है।

किन्तु प्रस्तावित “Clustering System” के अंतर्गत किसी महाविद्यालय को केवल विज्ञान, किसी को केवल कला तथा किसी को केवल वाणिज्य अथवा अन्य विशिष्ट विषयों तक सीमित करने का प्रयास किया जा रहा है। यह व्यवस्था पूर्णतः अव्यावहारिक, छात्र-विरोधी एवं शिक्षा-विरोधी है। यदि विद्यार्थियों को अलग-अलग संकायों के लिए विभिन्न महाविद्यालयों में जाना पड़ेगा, तो राज्य की संपूर्ण उच्च शिक्षा व्यवस्था गंभीर रूप से प्रभावित होगी।
1. *गरीब एवं ग्रामीण विद्यार्थियों पर प्रतिकूल प्रभाव*
इस व्यवस्था के कारण गरीब एवं ग्रामीण विद्यार्थियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। उन्हें परिवहन, आवास एवं अन्य खर्च वहन करने पड़ेंगे, जो अधिकांश परिवारों के लिए संभव नहीं है। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में विद्यार्थी उच्च शिक्षा छोड़ने को विवश होंगे।
झारखंड पहले से ही उच्च शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय औसत से पीछे है। ऐसी स्थिति में यह व्यवस्था विद्यार्थियों को शिक्षा से और दूर कर देगी।
2. *छात्राओं की शिक्षा पर गंभीर असर*
ग्रामीण एवं पारंपरिक परिवारों की अनेक छात्राएँ केवल निकटवर्ती महाविद्यालयों में ही अध्ययन कर पाती हैं। यदि विषयों के अनुसार उन्हें दूरस्थ महाविद्यालयों में जाना पड़े, तो उनकी शिक्षा बाधित होगी तथा महिला शिक्षा को गंभीर क्षति पहुँचेगी।
3. *राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) की मूल भावना के विपरीत*
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) बहुविषयी (Multidisciplinary) शिक्षा की अवधारणा को बढ़ावा देती है, जहाँ विद्यार्थी विभिन्न विषयों का अध्ययन कर सकें। परंतु प्रस्तावित “Clustering System” महाविद्यालयों को संकीर्ण विषय-केन्द्रित संस्थानों में बदलने का प्रयास कर रहा है।
वास्तविक बहुविषयी शिक्षा तभी संभव है जब एक ही महाविद्यालय में कला, विज्ञान एवं वाणिज्य सभी संकाय उपलब्ध हों।
4. *महाविद्यालयों की ऐतिहासिक पहचान समाप्त होने का खतरा*
वर्षों से स्थापित महाविद्यालय अपनी समग्र शैक्षणिक संरचना एवं बहुविषयी स्वरूप के कारण प्रसिद्ध हैं। यदि उनमें से विभिन्न संकाय समाप्त या स्थानांतरित कर दिए गए, तो उनकी ऐतिहासिक पहचान, शैक्षणिक गरिमा एवं सामाजिक महत्व प्रभावित होगा।
5. *शिक्षकों एवं कर्मचारियों के पदों पर संकट*
इस संकल्प में अनेक शैक्षणिक एवं गैर-शैक्षणिक पदों को “Surrender” करने तथा पुनर्गठन के नाम पर समाप्त करने का प्रस्ताव भी रखा गया है। जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में पहले से ही शिक्षकों एवं कर्मचारियों की भारी कमी है।
पदों की कटौती से शिक्षा की गुणवत्ता, शोध कार्य, परीक्षा व्यवस्था, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएँ एवं प्रशासनिक कार्य गंभीर रूप से प्रभावित होंगे।
6. *जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं पर सीधा खतरा*
झारखंड अपनी समृद्ध जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं, संस्कृति, परंपराओं एवं लोकजीवन के कारण पूरे देश में विशिष्ट पहचान रखता है। यहाँ की भाषाएँ केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि आदिवासी एवं मूलवासी समाज की ऐतिहासिक चेतना, सांस्कृतिक विरासत एवं सामाजिक अस्मिता की आधारशिला हैं।
वर्तमान में विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में संताली, हो, खड़िया, कुड़ुख, मुंडारी, नागपुरी, पंचपरगनिया, खोरठा एवं कुड़माली जैसी भाषाओं का अध्ययन-अध्यापन होने के कारण नई पीढ़ी अपनी भाषा, संस्कृति एवं परंपराओं से जुड़ी हुई है।
किन्तु प्रस्तावित “Clustering System” के अंतर्गत इन विभागों को सीमित अथवा स्थानांतरित किए जाने से जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के विभाग स्वतः कमजोर हो जाएंगे। अधिकांश विद्यार्थी दूरस्थ महाविद्यालयों में जाकर इन भाषाओं का अध्ययन नहीं कर पाएंगे, जिससे नामांकन घटेगा, विभाग निष्क्रिय होंगे तथा धीरे-धीरे ये भाषाएँ उच्च शिक्षा व्यवस्था से समाप्त होने लगेंगी।
यह केवल शैक्षणिक क्षति नहीं होगी, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक पहचान एवं भाषाई विरासत पर भी गंभीर आघात होगा।
7. *झारखंड को शिक्षा के क्षेत्र में और पीछे धकेलने वाला निर्णय*
झारखंड जैसे राज्य में आवश्यकता उच्च शिक्षा संस्थानों को मजबूत करने की है, न कि उन्हें विभाजित एवं कमजोर करने की। महाविद्यालयों को तोड़ने के बजाय उनमें शिक्षकों की नियुक्ति, आधारभूत संरचना, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएँ, डिजिटल सुविधाएँ एवं शोध व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
यदि यह व्यवस्था लागू होती है, तो झारखंड उच्च शिक्षा, भाषा एवं संस्कृति — तीनों क्षेत्रों में और अधिक पिछड़ जाएगा।
अतःकुलपति महोदया विनम्र प्रार्थना है कि—
1.“Restructuring एवं Clustering System” संबंधी उक्त संकल्प को तत्काल निरस्त किया जाए।
2.प्रत्येक महाविद्यालय में पूर्ववत कला, विज्ञान एवं वाणिज्य संकायों को यथावत रखा जाए।
3.जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के विभागों एवं अध्ययन-अध्यापन की वर्तमान व्यवस्था को सुरक्षित रखा जाए।
4.शिक्षकों एवं कर्मचारियों के पदों में कटौती बंद कर नियमित नियुक्तियाँ की जाएँ।
5.किसी भी नई व्यवस्था को लागू करने से पूर्व विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों एवं शिक्षाविदों से व्यापक विमर्श किया जाए।
हमें पूर्ण विश्वास है कि माननीय कुलपति महोदया से विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं राज्य के शैक्षणिक तथा सांस्कृतिक भविष्य के हित में संवेदनशील निर्णय लेते हुए इस जनविरोधी संकल्प को तत्काल निरस्त करने की कृपा करेंगे।
सधन्यवाद।
ज्ञापन सौंपने में मुख्य रूप से प्रदेश अध्यक्ष ओम वर्मा, प्रदेश वरीय उपाध्यक्ष ऋतुराज शाहदेव,प्रदेश सचिव राजेश सिंह ,रोशन नायक ,सक्षम झा महानगर अध्यक्ष अमन साहू निशांत लिंडा,,पंकज , पीयूष ,मोहन कुमार ,अब्दुल खान यश सोनी ,अभिषेक , राज दुबे ,रूपम सुष्मिता कुमारी,खुशी कुमारी,लिजा बेक,प्राची खलखो,फुलमनी कुमारी,नयना कुमारी ,सती कुमारी, मनीषा कुमारी,प्रीति कुमारी,रेशमा कुमारी, गीता ,सोनी, मनिता , काजल इत्यादि लोग उपस्थित थे।
