देश और समाज को तोड़ने वाली भाजपा अब सामाजिक समरसता का ढोंग कर रही है : ऋषीकेश सिंह

संविधान बदलने की बात करने वालों को आज दलितों की याद आ रही है : ऋषीकेश सिंह

रांची। दिनांक 28.07.2026

झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश सचिव सह प्रदेश प्रवक्ता ऋषीकेश सिंह ने भाजपा के तथाकथित “समरसता संकल्प अभियान” को राजनीतिक पाखंड बताते हुए कहा कि देश और समाज को जाति, धर्म और नफरत के नाम पर बांटने वाली भाजपा आज सामाजिक समरसता का पाठ पढ़ा रही है। इससे बड़ा विरोधाभास और कोई नहीं हो सकता। भाजपा और उसके वैचारिक संगठन वर्षों से ऊंच-नीच, छुआछूत और सामाजिक भेदभाव की मानसिकता को बढ़ावा देते रहे हैं। चुनावी लाभ के लिए आज संत रविदास के विचारों का सहारा लेना उनके दोहरे चरित्र का प्रमाण है।

ऋषीकेश सिंह ने कहा कि झारखंड के दलित और आदिवासी समाज ने भाजपा को पूरी तरह नकार दिया है। विधानसभा चुनाव में जनता ने भाजपा को सिरे से खारिज कर दिया, इसलिए अब संत रविदास के नाम पर अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की कोशिश की जा रही है। कल तक भाजपा के नेता संविधान बदलने की बातें कर रहे थे और आज उन्हें दलित समाज की याद आ रही है। बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के संविधान को कमजोर करने की मानसिकता रखने वालों को सामाजिक न्याय की बात करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। दलित समाज भाजपा के इस दिखावटी प्रेम और राजनीतिक छलावे में नहीं फंसने वाला है।

ऋषीकेश सिंह ने कहा कि यदि भाजपा वास्तव में संत रविदास के विचारों का सम्मान करती है तो उसे सबसे पहले समाज में नफरत और विभाजन की राजनीति छोड़नी चाहिए। सामाजिक समरसता भाषणों और अभियानों से नहीं, बल्कि संविधान के मूल्यों, सामाजिक न्याय और सभी वर्गों को समान सम्मान देने से स्थापित होती है।

ऋषीकेश सिंह ने कहा कि कांग्रेस पार्टी संत रविदास, बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर, बिरसा मुंडा सहित सभी महापुरुषों के विचारों को व्यवहार में उतारने में विश्वास रखती है, जबकि भाजपा चुनाव के समय केवल उनके नाम का राजनीतिक उपयोग करती है। झारखंड और देश की जनता भाजपा की इस राजनीतिक नौटंकी को समझ चुकी है।

अंत में ऋषीकेश सिंह ने कहा की भाजपा को संत रविदास के नाम पर राजनीति बंद कर पहले अपने आचरण में सामाजिक समरसता लानी चाहिए। दलित – आदिवासी समाज भाजपा के दिखावटी प्रेम और चुनावी नौटंकी को अच्छी तरह से समझ चूका है। संत रविदास के विचारों का सम्मान भाषणों से नहीं, बल्कि समानता और सामाजिक न्याय के मूल्यों को अपनाने से है।

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